सत्संग का हमारे जीवन पर प्रभाव

सत्संग का महत्व

श्री  राम चरित  मानस में बाबा  गोस्वामी तुलसीदास  जी कहते हैं,
चौपाई-
बिनु सत्संग विवेक न होई।
                 राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
भावार्थ- सत्संग  के बिना विवेक नहीं  होता और श्री राम जी  की कृपा वह सत्संग सहज में  मिलता नहीं ।

कहने  का तात्पर्य  है, जब तक सत्संग  नहीं करोगे तब विवेक  यानि कि परमज्ञान तत्व  प्राप्त नहीं होगा, और जब  तक श्री राम जी की कृपा नहीं  होगी तब तक हमें सत्संग की प्राप्ति  भी होने बाली नहीं, प्रभु की कृपा कब  होती है, जब हम मोह माया रुपी संसार से  अलग हटकर एकांत में वास करें, निर्मल रूपी  मन को अन्धकार से दूर रखें और ये कब होगा जब  हम सन्तों का सम्मान, उनकी सेवा करें जहाँ सन्त समागम  हो वहां पर जायें उनकी वाणीं को सुनें और उनके एक-एक शब्दों  को अमृत समझकर अपने ह्रदय में धारण करें, तब कहीं जाकर प्रभु'  हम पर कृपा करेंगे ।

जब  हम कृपा  होती है तब  हमारे ह्रदय में  सत्य का संचार होता  है और सत्संग सुनने का  अवसर प्राप्त होता है ऐसे  अवसर को कभी गवाना नहीं चाहिए  चाहें वो गाँव के मन्दिर में हो  अथवा किसी तीर्थ स्थल पर क्योंकि वह  एक अमृत रुपी ऐसी रसधारा है, जिसके कण-कण  में एक सिद्धांततः वैराग उत्पन्न होता है, भटके  हुए प्राणी को सही रास्ता दिखलाकर भक्ति मार्ग  पर चलने की प्रेरणा देता है जो हमें मोक्ष के द्वार  तक ले जाकर जन्म जनमान्तरो का फल प्रदान करता है, जिसका  उदाहरण हमारे रिषि-मुनियों ने भी दिया है ।




एक  बार महर्षि  विश्वामित्र जी  को अपने तपोबल पर  बहुत बड़ा अहंकार हो  गया और वो अपने आप को  वशिष्ठ जी से सर्व श्रेष्ठ  मान बैठे और उन्हें जब तब नीचा  दिखाने की कोशिश करते रहते, एक दिन  घूमते-घूमते अपने अहंकार के मद में चूर  ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी के आश्रम जा पहुँचे,  परन्तु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ जी अन्तरभाव से ही  उनके आने का कारण समझ गये और जैसे ही महर्षि  विश्वामित्र जी उनके आश्रम पहुँचे तो वशिष्ठ जी ने  उन्हें आदर सनमान के साथ बिठाया और जलपान कराया तभी  विश्वामित्र जी ने भेंट में वशिष्ठ जी को अपने दस हजार  बर्ष की तपस्या का फल प्रदान कर दिया और तभी वशिष्ठ जी ने  भी उनके आवभगत में पल भर के सत्संग का फल प्रदान कर दिया इतने  में विश्वामित्र जी रुष्ट होकर कहने लगे कि मैंने तुम्हें दस हजार  बर्ष तपस्या का फल प्रदान किया और तुमने मुझे बदले में बहुत छोटी सी  सत्संग की तुच्छ भेंट प्रदान की जिसका कोई महत्व ही नहीं है, तभी वशिष्ठ  जी कहने लगे कि मैंने तुम्हें जो प्रदान किया वो तुम्हारे दस हजार बर्षों की  तपस्या से कई गुना ज्यादा है, विश्वामित्र ने कहा कि तुम तपस्या का कोई औचित्य  ही नहीं समझते तुम मेरा अपमान कर रहे हो वशिष्ठ जी कहने लगे कि जो फल करोड़ों बर्ष  तपस्या करने के पश्चात भी नहीं प्राप्त किया जा सकता वो फल एक झण सत्संग से प्राप्त किया  जा सकता है यकीन ना हो तो कहीं भी चलकर इसका फैसला करा सकते हो, इतनी बात सुनकर विश्वामित्र  वशिष्ठ जी को साथ लेकर निकल पड़े ।




सबसे  पहले वो  दोनों देवराज  इन्द्र के पास  पहुंचे वहां जाकर  उन्होंने ने अपनी-अपनी  व्यथा सुनाई व्यथा सुनने  के बाद देवराज इन्द्र ने काफी  देर चिंतन करने के पश्चात सोंचा  कि दो महारिषिओं का फैलना करुँगा तो  किसके पक्ष में करुँगा इसलिए देवराज ने  दोनों रिषिओं को ब्रह्मा जी के पास भेज दिया  ब्रह्मा जी के पास गये और वहां भी वही बात रखी  गयी लेकिन ब्रह्मा जी से भी उसका हल ना निकल सका   क्योंकि ब्रह्मा जी ने सोंचा कि अगर वशिष्ठ जी पक्ष में  फैंसला करता हूँ तो विश्वामित्र रुष्ट हो जायेंगे और विश्वामित्र  जी के पक्ष में फैंसला करूँगा तो वशिष्ठ जी रुष्ट हो जायेंगे फिर  पता नहीं ये दोनों क्या कर बैठें इससे अच्छा है कि दोनों को ऐसी जगह  भेजो, ताकि फैंसला भी हो जाये और बात भी ना बिगड़े तभी ब्रह्मा जी ने काफी  विचार विमर्श के बाद तीनों लोकों का भार सिर पर रखे हुए सहस्र मुख बाले श्री  शेष जी के पास भेज दिया जब दोनों शेष जी के पास पहुंचे शेष जी ने दोनों रिषिओं  का आदर सत्कार किया और वहाँ आने का कारण पूछा तभी दोनों रिषिओं ने विस्तार पूर्वक अपना-अपना  वृतांत सुनाया दोनों रिषिओं की बात सुनने के बाद शेष जी ने कहा ठीक है मैं फैंसला करने के लिए  तैयार हूँ परन्तु इससे पहले जो मैं तीनों लोकों का भार लिये खडा हूँ वो आप दोनों में से किसी एक  को भार रोकना होगा जिससे कि मैं थोड़ी देर आराम कर सकूँ तभी मैं आप लोगों का फैंसला करने को समर्थ  हो सकूँ तो पहले आप आइये विश्वामित्र जी क्योंकि आप में दस हजार बर्षों की तपस्या का बल है आप तो इतना  भार सहन करने की छमता रखते होंगे, इतनी बात सुनकर जैसे ही विश्वामित्र जी आगे बढ़कर भार रोकने के लिए तैयार  हुए तभी शेष जी ने नाम मात्र हल्का सा भार ढीला किया कि विश्वामित्र जी अपने आप को छणिक भर भी सम्हाल ना सके  और पीछे की ओर हट गये फिर शेष जी ने वशिष्ठ जी से कहा कि आप अपने छण भर सत्संग के बल के द्वारा तीनों लोकों का  भार रोक कर खड़े हों तब हम दोनों का निर्णय करें वशिष्ठ जी आये और अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए तीनों लोकों का  भार अपने ऊपर ले लिया कुछ छण बाद स्वतः शेष जी ने सारा भार अपने ऊपर ले लिया और बोले जाओ आप लोगों का निर्णय हो गया  इतने में विश्वामित्र जी बोले कैसे हुआ कुछ बताइए तो अभी तो तुमने कुछ बोला भी नहीं शेष जी कहने लगे तो सुनिए महानुभाव तुमने  दस हजार बर्ष तपस्या करने के पश्चात भी पृथ्वी का रत्ती भर भार सहन नहीं कर सके और वशिष्ठ जी ने मात्र छण भर सत्संग के सतबल पर  तीनों लोकों का भार रोक लिया क्योंकि सत्संग एक सत्य का संग यानि कि सत्य से सराबोर सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है ।

शेष  जी का  निर्णय सुनकर  दोनों रिषी मुनि  प्रसन्नता पूर्वक अपने-अपने  आश्रम को गये ।




जहाँ  तक विद्वानों  बात की जाए तो  सत्संग को ही सबसे  बड़ा महत्व दिया गया  है, क्योंकि इसी से हमारे  मन में चेतना प्रगट होती है,  यहीं से भक्ति जप तप नियम धरम  का प्रादुर्भाव जाग्रत होकर हमारे  ह्रदय में अध्यात्म का बीज अंकुरित  होता है ।

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